गोदना पेंटिंग के जनक – शिवन पासवान

गोदना पेंटिंग के जनक - शिवन पासवान

गोदना पेंटिंग के जनक – शिवन पासवान

गोदना पेंटिंग में मिथिला (मधुबनी) पेंटिंग को एक नया विस्तार दिया है और इस शैली के जनक के रूप में लहेरियागंज (मधुबनी) के शिवन पासवान का नाम बड़े ही आदर के साथ लिया जाता है | 04 मार्च, 1956 को पिता रामस्वरुप पासवान और माता कुसुमा देवी के परिवार में इनका जन्म हुआ था |

उच्च जाति के कलाकारों का वर्चस्व तोड़ा

जाति व्यवस्था भारतीय समाज की कड़वी सच्चाई है | ऊंच-नीच का श्रेणी-विभाजन करके यह सदियों से करोड़ों-करोड़ लोगों को अपमानित और उत्पीड़ित करती आई है | सदियों से चली आ रही इस भेदभावपूर्ण व्यवस्था के विरोध में साहित्य और कला-संस्कृति के क्षेत्र में समय-समय पर आवाज़ें उठती रही है | साहित्य के क्षेत्र में जाति-व्यवस्था के प्रतिरोध में उठा स्वर दलित साहित्य की अवधारणा के रूप में स्थापित हुआ है तो कला संस्कृति विशेषकर मिथिला (मधुबनी) पेंटिंग के क्षेत्र में वह गोदना पेंटिंग के नाम से ख्यात है | गरीबी की फटेहाली में सामाजिक विभेद का दशं सहते-सहते लहेरियागंज, वार्ड नं. 1, मधुबनी से कला के दम पर हांग-कांग, इटली, फ्रांस तक में अपनी गोदना कला का परचम फहरा दिया गया है शिवन पासवान ने | जिस मिथिला चित्रकला में रामायण, महाभारत जैसे पौराणिक संदर्भों को ही दर्शाया जाता था , कायस्थ और ब्राह्मण कलाकारों का ही वर्चस्व था, उसे तोड़ा शिवन पासवान ने |

साहसी शिवन ने की एक नई परंपरा की शुरुआत

साहसी शिवन ने की एक नई परंपरा की शुरुआत

समाज के हाशिए पर पड़े दुसाध समुदाय के नायक थे राजा सलहेस-राज मैसोदा के राजा | दुसाध समुदाय की लोक स्मृति में उनकी छाप थी | उनको विषय बनाकर मिथिला पेंटिंग में एक नई परम्परा की शुरुआत करना एक बड़े ही साहस का काम था| | लेकिन शिवन घबराये नहीं | फिर क्या था -आगे का मैदान इनका था | पूरे परिवार को मिथिला कला में झोंक दिया | कीर्तिमान ऐसा बनाया कि राष्ट्रपति जैल सिंह के हाथों राष्ट्रीय पुरस्कार और बिहार सरकार से राज्य पुरस्कार पाकर सम्मानित हुए | मां कुसुमा देवी, बेटे कमलदेव पासवान तक को बिहार का राज्य पुरस्कार प्राप्त हुआ | पत्नी शांति देवी को राष्ट्रपति पुरस्कार मिला| यह सामाजिक स्थिति का अतिक्रमण था |

जाति न पूछो कलाकार की

कला कोई भेद नहीं करती | जाति न पूछो साधु की | लौकिक मान्यता में यह क्षेपक जुड़ गया कि जाति ना पूछो कलाकार की | कलाकार के लिए सामाजिक स्थिति का कोई बंधन नहीं होता- वह कोई भी ऊँचाई छू सकता है | शिवन पासवान बिहार के ऐसे पहले कलाकार हैं जिन्होंने इसे प्रमाणित किया |

गरीबी का साम्राज्य था- किसी तरह मजदूरी कर परिवार की परवरिश होती थी | प्रतिकूल परिस्थिति के बावजूद बालक शिवन की जिद पर उसका नामांकन स्थानीय स्कूल में कराया गया | 10वीं तक की पढ़ाई इन्होंने वहाँ से की | तभी मिथिलांचल में भीषण अकाल पड़ा | लोग दाने-दाने को मोहताज हो गए | उस समय तक मिथिला पेंटिंग जमीन और दीवारों पर ही बनायी जाती थी और वह भी उच्च जाति की महिलाओं के द्वारा | ब्राह्मणों की भरनी और कायस्थों की कचनी शैली थी | अकाल के दौरान मिथिला कला से जुड़ी महिलाओं को रोजगार देने के उद्देश्य से सरकार ने उनके व्यावसायिक उपयोग के लिए प्रेरित करना शुरू किया | फलस्वरूप वह दीवारों से उतरकर कागज एवं कपड़े पर आ गई | शिवन के मन में भी इस चित्रकला को सीखने और इसके व्यावसायिक उपयोग का जुनून सवार हुआ | उस समय तक रामायण और महाभारत से जुड़े प्रसंगों को ही मिथिला पेंटिंग में चित्रित किया जाता था | शिवन लुक-छिपकर उनका अध्ययन करने लगे | इनकी माँ को भी उस पेंटिंग की थोड़ी-बहुत जानकारी थी | उनसे भी सीखने लगे | समस्या यह थी कि शिवन या उनकी माँ को पौराणिक आख्यानों की जानकारी नहीं थी | लेकिन सौंदर्य के प्रतीक के रूप में उनके समुदाय की महिलओं के शरीर पर गोदना गोदे जाने का प्रचलन था | गोदना को स्त्री में दर्द सहन करने की शक्ति के रूप में देखा जाता था | जीवन के उतार-चढ़ाव और सुख-दुख को वहन करने की क्षमता का विकास गोदना गुदवाने से ही माने जाने की मान्यता थी | सामान्यत: वनस्पति, पशु-पक्षी, सूर्य, चंद्र, पति का नाम या किसी घटना के स्मृति चिह्न को उनके शरीर पर अंकित किया जाता था | गोदना के उन डिजाइनों को शिवन कागज पर उतारने लगे | गेंदा, सूरजमुखी आदि फूलों के रंगों से पेंटिंग बनाना शुरू कर दिया | गोदना पेंटिंग की रेखाओं को छोटा कर चित्रकारिता शुरू की | इसने इन्हें बाजार की मांग में ला दिया | इनके प्रयोग का सिलसिला चलता रहा |

उनकी प्रेरणा एवं मार्गदर्शक

शिवन के सामने दुसाध समुदाय के नायक राजा सहलेस थे, जिनकी वीरता और जिनके वाहनों की तपस्या का कथानक उनके समुदाय की स्मृतियों में रचा-बसा था | बस क्या था- शिवन को चित्रों के लिए नया फलक मिल गया | उन्होंने राजा सहलेस के कथानक को अपने चित्रों में पिरोना शुरू कर दिया | राजा सलहेस के अलावा दीना-भदरी और महात्मा बुद्ध की गाथाओं और उपदेशों पर आधारित चित्र भी बनाने लगे | फिर इन्हें उपेंद्र महारथी का संरक्षण और सहयोग मिला | ये पटना आकर उपेन्द्र महारथी के मार्गदर्शन में चित्रों की रचना करने लगे | पटना इनका अस्थायी ठिकाना हो गया | यह मिथिला पेंटिंग की शैली का नया अध्याय बन गया | इनका नाम हो गया | एक नई कला-पटरी पर जीवन उतर गया | एक नया डिमांड क्रिएट हो गया | कायस्थों की कचनी और ब्राह्मणों की भरनी शैली से इतर गोदना शैली में जीव-जंतुओं, पेड़-पौधे, आस-पड़ोस के जीवन को तीर और सघन वृतों के माध्यम से उकेरना जारी रखा | शिवन पासवान द्वारा बनाई जाने वाली गोदना पेंटिंग की रेखाओं में एक अनगढ़पन होता है, जो उसे विशिष्ट बनाता है | गोदना पेंटिंग की इनकी शैली कायस्थों की कचनी और ब्राह्मणों की भरनी शैली से इतर है | लेकिन उन शैलियों से प्रेरित भी है |

कला के प्रति समर्पण

आज बाजार में शिवन पासवान के चित्र 500 से 10,000 रु में बिकते हैं | ये वॉल-पेंटिंग भी कर रहे हैं | वर्गफीट की दर से इनका भुगतान मिलता है | पूरा परिवार कलाकारिता को जीवन-मर्म बनाकर भिड़ा हुआ है | बेटी की शादी हो गई | वह भी पेंटिंग से जुड़कर नाम कमा रही है | इसे कहते हैं कला के प्रति समर्पण | राजा सहलेस के जीवन के कथानक के ऊपर इनके द्वारा बनाई गई पेंटिंग को पटना के बिहार संग्रहालय प्रदर्शित किया गया है | शिवन पासवान की साधारणता में असाधारणता है | कोई भेदभाव नहीं है | लोक को समर्पित हर चरित्र इनकी पेंटिंग का विषय है | इन्होंने मीराबाई और गोविंद की कला श्रृंखला बनाई है | धर्मराज युधिष्ठिर पर आधारित चरित्र का प्रकाश बिखेरने वाले पौराणिक पात्रों को भी केंद्र में ला रहे हैं | इनकी लंबी साधना कला के प्रति समर्पण की मिसाल है | लहेरियागंज को कला मंडप में बदल दिया है | प्रयोग की ऐसी जमीन विकसित की है कि देश-विदेश में जहाँ कहीं भी प्रदर्शनी लगती है, प्रयोग धार्मिता को मापदंड की तरह प्रदर्शित करने के लिए शिवन पासवान की खोज होती है |

“पैसा कमाऊ मशीन” बनते जा रहे हैं आज के युवा कलाकार

70 के दशक से राजा सहलेस और अन्य नायकों के जीवन वृत को अपने रंग से रंगते-रंगते शिवन आज लीजेंड बन गए हैं- एक जीवित दंतकथा | गोदना पेंटिंग के काम को इन्होंने इस दरजे तक पहुंचा दिया है कि राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय बाजार में उसकी एक विशिष्ट पहचान बन गई है | लेकिन शिवन पासवान आज भी परिस्थितियों से जूझ रहे हैं | कारण उस संक्रामक भयंकर रोग से जिसका नाम व्यापारिकता है और जो आज के कलाकारों को बेतरह ग्रस रहा है, उससे वे बिलकुल मुक्त है । वे कहते भी हैं की आज के युवा कलाकार व्यापारिकता के करण अपने कोमल भावों को तिलांजलि देकर “पैसा कमाऊ मशीन” बनते जा रहे हैं |

फुलवारी में बदल दी अपनी कलाकारी

अपनी कला के प्रति समर्पित शिवन पासवान वर्तमान में मधुबनी एवं उसके आसपास के क्षेत्रों में गरीब एवं निर्धन परिवार के युवकों को मुफ्त में प्रशिक्षण दे रहे हैं | अब वे अपनी पेंटिंग में फूलों का रंग नहीं, 50-60 साल तक चटक दिखने वाले एक्रेलिक रंगों का उपयोग कर रहे हैं | इन्होंने अपनी कलाकारी को फुलवारी में बदल दिया है | इनकी प्रेरणा से गांव के गांव कला की फुलवारी में तब्दील होते जा रहे हैं | लेकिन फिर भी यह व्यक्ति तनिक भी अन्यथा दिखने का इच्छुक नहीं है | इन्हें अपने महत्व का पता नहीं है | शिवन पासवान को अपने संबंध में सिर्फ इतना ही पता है कि कोटि-कोटि कलाकारों के बीच वह भी एक कलाकार है |

Write a comment