कुछ महीने पहले 26 जनवरी को भारत सरकार के द्वार राष्ट्रीय सम्मान समारोह हुआ था। उसमे एक नाम उभर कर आया, गोदावरी दत्ता। शायद आप, अभी भी नही समझ पाए होंगे की हम किस की बात कर रहे है। एक ऐसी महान व्यक्तित्व जिन्होंने 83 वर्षो तक अथक प्रयास कर के अपने क्षेत्रीय कला को एक नया आयाम एवं अलग पहचान दिलाया है। हमने मिथिला कला के बारे में बहुत सुना एवं पढ़ा होगा, कुछ लोगो ने इस कला को देखा भी होगा । मिथिला कला एक पारंपरिक कला है, जो एक पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है । ये मुख्यतः माँ अपनी बेटियों को एक परंपरा के रूप में सिखाती है। इसकी उत्पति बिहार के मिथिला में हुआ था, अब ये मिथिला और मधुबनी की पहचान बन चुकी है. आज कल ये मधुबनी पेंटिंग के नाम से चलन में है ।

गोदावरी जी ने अपने अद्भुत कला के ज्ञान से आज मिथिला कला को पुरे विश्व में एक अलग सम्मान दिलाया है, जिससे पूरे भारत-वर्ष का सम्मान बढ़ा है। उनको ये कला उनकी माँ सुभद्रा देवी से विरासत में मिली। कला के प्रति लगाव और जुनून को देखते हुए 1960 में राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया गया तथा 2006 में उनके कला प्रतिभा को देखते हुए उनको “शिल्प गुरु” के नाम से संबोधित किया गया था। कला उत्थान के क्षेत्र में उनके योगदान लिए उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया।

एक वाक्य है “Have patience and faith and keep doing the right thing…” ये वाक्य गोदावरी जी के चरित्र को बताता है। ये सफर उनके लिए लिए आसान नही था, एक मध्यम वर्ग में जन्मी लेकिन अपने माँ से मिली ज्ञान और अपने दृढ संकल्प से जीवन के सारे कठिन पड़ाव पार करते हुए आज “शिल्प गुरु” के नाम से जानी जाती है. DAD गोदावरी जी की ज्ञान रूपी तपस्या, इच्छा शक्ति एवं दृढ़ निश्चय के लिए उन्हे नमन करती है। “जय हिन्द”

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